भाषा / Language
इतना खर्चे जाने पर भी मैं खुद में बाक़ी हूँ
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इतना खर्चे जाने पर भी मैं खुद में बाक़ी हूँ....
उस बाक़ी को लिख देती हूँ
एक समंदर .....पिछले पन्नों पर
एक आकाश .....अभी मेरे अंदर इस पन्ने पर
और एक रेगिस्तान..... आगे के सभी पन्नों पर
बचा रहता है
"अनहद " शब्द को मैं मायने दे रही हूँ
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें