कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 1470

भाषा / Language

बागबानी आज यूँ ही गुमसुम उदास बैठी थी

बागबानी आज यूँ ही गुमसुम उदास बैठी थी बैठे बैठे रुस्वा ख्वाब की कली पर तन्हाई छिड़क रही थी छिड़कते छिड़कते बंजर याद के झुरमुठ उलट पलट देख रही थी देखते देखते अधजली ख्वाइश की सूखी पतियाँ नोच रही थी नोचते नोचते बिखरी उमीद का लटका सा फूल ढूंढ रही थी ढूंढते ढूंढते टूटे वादे की जड़ को अश्कों संग दबा रही थी बस ऐसे ही ठूँठ सी याद को जिला रही थी किसी ने प्यार से पूछा ..... कल्पना तुम रो रही थी ? मैंने कहा .......नहीं तो बस बागबानी कर रही थी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें