भाषा / Language
बागबानी आज यूँ ही गुमसुम उदास बैठी थी
✦
बागबानी
आज यूँ ही गुमसुम उदास बैठी थी
बैठे बैठे
रुस्वा ख्वाब की कली पर तन्हाई छिड़क रही थी
छिड़कते छिड़कते
बंजर याद के झुरमुठ उलट पलट देख रही थी
देखते देखते
अधजली ख्वाइश की सूखी पतियाँ नोच रही थी
नोचते नोचते
बिखरी उमीद का लटका सा फूल ढूंढ रही थी
ढूंढते ढूंढते
टूटे वादे की जड़ को अश्कों संग दबा रही थी
बस ऐसे ही ठूँठ सी
याद को जिला रही थी
किसी ने प्यार से पूछा .....
कल्पना तुम रो रही थी ?
मैंने कहा .......नहीं तो
बस बागबानी कर रही थी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें