कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1464

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जिगर में इक तड़पता सा सवाल उभरा है

जिगर में इक तड़पता सा सवाल उभरा है ...... क्या वाक़ई इश्क अंधा है या मेरे लिए ही बहरा हुआ है ? क्या ये वही बुलबुला है जो बरसों से मुझमें ठहरा हुआ है ? पहले इक लकीर थी हाथों की अब क्यों यादों का जखीरा हुआ है ? मेरे वजूद का मलहम सा था कभी आज वो कैसे जख्म गहरा हुआ है ? तेरी मौजूदगी को ओढ़ते थे रात भर तू ही सपने लूट कर सवेरा हुआ है ? अपने नहीं ,तेरे नूर से सजते थे आज वही क्यों बेज़ार चेहरा हुआ है ? बादशाहत थी इश्क के खेल में मेरी आज क्यों वो बेरब्त मोहरा हुआ है ? सुरमई शामें उजले दिन आज क्यों हर और कोहरा हुआ है ? शायद ..... वो बदल गया है शायद ..... वो छल गया है शायद.....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें