भाषा / Language
जिगर में इक तड़पता सा सवाल उभरा है
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जिगर में इक तड़पता सा सवाल उभरा है ......
क्या वाक़ई इश्क अंधा है
या मेरे लिए ही बहरा हुआ है ?
क्या ये वही बुलबुला है
जो बरसों से मुझमें ठहरा हुआ है ?
पहले इक लकीर थी हाथों की
अब क्यों यादों का जखीरा हुआ है ?
मेरे वजूद का मलहम सा था कभी
आज वो कैसे जख्म गहरा हुआ है ?
तेरी मौजूदगी को ओढ़ते थे रात भर
तू ही सपने लूट कर सवेरा हुआ है ?
अपने नहीं ,तेरे नूर से सजते थे
आज वही क्यों बेज़ार चेहरा हुआ है ?
बादशाहत थी इश्क के खेल में मेरी
आज क्यों वो बेरब्त मोहरा हुआ है ?
सुरमई शामें उजले दिन
आज क्यों हर और कोहरा हुआ है ?
शायद .....
वो बदल गया है
शायद .....
वो छल गया है
शायद.....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें