कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1444

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ये क्या

ये क्या ? तुम फिर मुंह लटका कर खड़े हो गए और ये .....टसुए क्यों बहा रहे हो ? "जा रही हो "....."जा रही हो" ... क्यूँ चिल्ला रहे हो ? नए साल को अगर ..... ख्वाब ....ख्वाइशें ...उमींद दे रही हूँ तो जाते जाते .... तुम्हें भी तो यादों ....तजुर्बों का तोहफा दिया है क्या बच्चों की तरह ..... मेरा पल्लू खींच रहे हो मेरी उँगलियों को .... हथेलियों में भींच रहे हो जाने दो मुझे ..... साल भर के ....."इश्क "का ही तो ... "वादा" था तुमसे ऐसी ही तो हूँ "मैं" ......जानते तो हो ! तुमसे पहले भी .....कितने सालों का मलबा रखा हुआ है अंतर्मन में सब में ....खुद को ... थोडा थोडा रखा हुआ है मन में तुम भी रख लो .....थोडा सा मुझे और .....विदा दो देखो .... नया साल .... कितना "रूमानी "दिख रहा है भरोसा है मुझे ..... "साल भर का ये इश्क" भी ...... "मुकम्मल "रहेगा मेरा @कल्पना लाइव😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें