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रचना 1399

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जिस आसमान से इंसान ही चींटी लगे

जिस आसमान से इंसान ही चींटी लगे वो सोच ,वो ऊंचाई किस काम की ? ईमान का खाकर ,ईमान से बोलें ये खूबी हो नहीं सकती इस अवाम की पहियों में लिपट के दौड़ रही है जिंदगी मन्नत सी हैं ,चाय की चुस्कियां शाम की बेटा शहीद हुए अरसा हो गया ये चिट्ठी लौटने की किसके नाम की ? हसरतों से ही भर जाता है ये पैमाना उम्मीद ही खासियत है इस जाम की बड़ी गर्मजोशी से विराजे थे साहब फिर ये आवाज़ कैसी हुई धड़ाम की ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें