ककल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1374

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हम बुध्दु हैं क्या ?😊😊😊

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हम बुध्दु हैं क्या ?😊😊😊 याद नहीं हमने कभी एक दूसरे को कोई ख़त लिखा हो। हाँ... खामोशियाँ आदतन रोज़ भेजी। रेत घड़ी हमारा डाकिया थी हर बार। मुझमें नायाब जैसा कुछ भी नहीं ... बस कुछ अर्ज़ियाँ हैं जो सफेद स्याही से लिखी गईं हैं .... गुपचुप और लौटी भी हैं बड़ी चुप चुप राहत आसान थी पर मैंने उस मन का प्रेम चुना जो मेरे लिए मूक था। राह नहीं ....मुझे राही पसंद था .... अपना पसंदीदा प्रेम अनलिखा हो चाहे अनकहा भी.... अपनी तरफ ही आता सा लगता है। हम बुद्धधु हैं क्या ? शब्दों से सपने देख लेते हैं। धत्त! 😊😊😊 तुमसे मिली तो जाना... मिलकर पाने और पाकर मिलने में बहुत फ़र्क़ है। सुनो.... कुछ नए पत्ते टांक जाते मुझमें। थोड़ा रुककर बहुत सारा बोल जाते मुझमें उदासी की अरज... खुद से
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें