कल्पनाशब्दों के बीच
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आसान नहीं है.... इक "निर्वात" को रोज़ ढोना

आसान नहीं है.... इक "निर्वात" को रोज़ ढोना निर्वात जो ..... शब्दों का भी है खामोशियों का भी तुम्हारा भी है और शायद ....मुझमें मेरा भी बस ... इक कल्पना है मेरी जो इसे नापती जाती है और रोज़ पाटती जाती है सिर्फ तुम्हारे लिए .... सिर्फ हमारे लिए .....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें