कल्पनाशब्दों के बीच
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रोज़ रोज़

रोज़ रोज़.... अधूरे अधूरे खुदा बनने से अच्छा इक दिन ... पूरे पूरे इंसान बन कर देखते मैं बेहतर समझ आती ......शायद
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें