कल्पनाशब्दों के बीच
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स्त्री अपनी कब्र खुद खोद लेती है ।

स्त्री अपनी कब्र खुद खोद लेती है । इस वाक्य को मैं दो तरह की स्त्रियों के लिए प्रयोग करना चाहूंगी ।एक उन्मुक्त स्त्री के लिए और एक अरक्षित स्त्री के लिए। स्त्री कम में स्वर्ग और अपने लिए ज्यादा मांगकर नर्क भी खुद ही बना सकती है। Insecurity मन की धारणा नहीं मन पर धब्बा है। ये काले के सिवा कुछ नहीं देखता और नाहक वजह को बेवज़ह बनाता जाता है। स्त्री मन चाहे तो कल्पना को उजास से रंग दे या संशय से ....या फिर कयास से खुजराहो एक ऐसे विचलित स्त्री मन की कहानी है जो आसपास सब कुछ अच्छा होते हुए भी फ़िज़ूल खुद को उजाड़ने का मन लिए बैठी है। अपने रिश्ते को खोखला करती स्त्री अपने समर्पित रिश्ते को भी खो देती है। रिश्ता कब रिसता हो जाए.... पता नहीं चलता Vijayshree Tanveer जी आपकी खुजराहो पढ़ ली ....कहानी का जादूगर मुझे भा गया।😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें