कल्पनाशब्दों के बीच
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तुम्हारे शब्दों से भी उसी सिगरेट की गंध आती है जिसे तुम होठ…

तुम्हारे शब्दों से भी उसी सिगरेट की गंध आती है जिसे तुम होठों से लगाए लगाए राख कर देते हो । देखो कागज़ भी सुलग रहा ।बस...... शब्दों का धुआं है जो हवा में नहीं मेरे जहन की तह से चिपक गया है। पास रखी ऐशट्रे है ....पर जाने क्यों खाली है। सारी राख शायद हवा में घुल गई । जादूई गंध लिखना प्रेम जैसा ही हानिकारक है...... सिगरेट छोड़ दो यार। 😊😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें