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बहुत सारा कहना था तुम्हें ।उससे भी कहीं ज्यादा लिखना था।पर…

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बहुत सारा कहना था तुम्हें ।उससे भी कहीं ज्यादा लिखना था।पर ये तो तब होता ना जब तुम सुनाई देते। एक तरफ़ा क्या लौटा है आज तक ? और जो लौटा भी होगा वो मायूस ही रहा होगा। कई बार हम जाते तो बहुत हैं ,पर पहुंच नही पाते। सोचते ज्यादा हैं ना... तो दिल पैरों से लिपट जाता है। और मुठ्ठियों में चाहनाएँ सूख जाती है। स्नेह अपार पर .....भूत ,वर्तमान और भविष्य की calculation में सब जड़ हो जाता है। अपने दिल मे पत्थर क्यों चिपका लेते हैं हम?कह क्यों नही देते ? मोगरे की लड़ियाँ सूख न जाएं इस डर से उसकी महक उंगली से खुरच कर निकाल देना ... गलत है। कहो ... कहो मेरी तरह। कहना सुन्दर है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें