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रचना 1203

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कभी सोचती हूँ बेवज़ह कह दिया उस रोज़ तुमसे

कभी सोचती हूँ बेवज़ह कह दिया उस रोज़ तुमसे तुमने तो वो जरिया भी रख लिया। कोई अलग नहीं हो सकता क्या तुमसे ? अबोला प्रेम ... ये मंज़र रोक देने वाला प्रेम पत्थर सा बस रख देने वाला प्रेम देखलो पर जियो मत वाला प्रेम लिखो मत मिटा रहने दो वाला प्रेम दिखो मत छिपे रहो वाला प्रेम दिखाओ मत रुके रहो वाला प्रेम भरपूर पर..... जताओ मत वाला प्रेम ये भनक ना लग जाने वाला कहीं सुकून न दे दे वाला प्रेम ना मुस्कुरा सकने वाला ना रो सकने वाला प्रेम कहाँ रखूं बस ये भी बता दो...... इतना भर भर जो प्रेम दे रहे वो अपनी जादूगरी भी तो दे दो मुझमें तो तुम भरे हुए हो.... ये अबोला प्रेम कहाँ धरूँ
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें