भाषा / Language
पहले शहर ही थे
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पहले शहर ही थे
फिर उनके बीच रात और दिन भी आ गए।सरहदें बदल गयी थी ना।
वो जो ज्यादा से थोड़ा सा कम था और कम से थोड़ा ज्यादा था ना .....
वो भी न्यून हो गया ।
चिट्ठियां अब चाँद और चकोर की नाम की लिखी जाने लगी
और पता .....जाने किस शहर की रात का और जाने किस सरहद के दिन का।
शुभ रात
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें