भाषा / Language
बस तुमसे मिले दुःख ही अजनबी थे
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बस
तुमसे मिले दुःख ही अजनबी थे ......
पन्नों पर लिखा जाने वाला प्रेम
हर बार मेरा अपना था ।
तुम्हें आखरी बार मुझमें से जाते हुए देखना
फिर भी आसान था
पर ये जो संजोये पल
तुम मेरे हथेलियों में दबा गए हो
और वो तुम्हारी
तमाम आधी कच्ची आधी पकी नज़्में...
उन्हें कहाँ प्रवाहित करूं?
टेबल पर रखी तुम्हारे नाम की डायरी
खुली नहीं आज तक
पर हर दुख ....हर याद
दर्ज़ है सिलसिलेवार
ब्यौरा है इस बात का
कि किसी के जाने के बाद
कहीं जाया ही नहीं जाता।
बस वहीं जम जाना होता है।
बताओ क्या ये आसान है ?
जाना भी ....
और रुके भी रहना।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें