भाषा / Language
रेत ही रेत हैं हम
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रेत ही रेत हैं हम
और तुम
आकाश कहते हो
छुआ भी नहीं
और तुम
आभास कहते हो
ये रास्ते
किधर भी नहीं जाते
और तुम
हो की इन्हे
उजास कहते हो
इक हंसी
ओढ़े बैठे तो हैं लब पर
और तुम
इसे ज़बरदस्त
लिबास कहते हो
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें