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पहाड़ पर उग आने वाली रातें

पहाड़ पर उग आने वाली रातें ... धुन-ध्वनियां कम ही पहनती हैं इसलिए बहुत introvert हैं पर लिखती है...... डांसि पत्थर से हर पुराने चीड़ पर अपनी प्रेम कविताएँ हर बार नया प्रेम ......नया प्रेमी लिखती हैं बांवरे जंगलों के लिए अपनी लहक पर उससे भी ज्यादा अपनी गमक घुप्प सी ..... दबे पांव .... काला घूंघट ओढ़े साफ साफ अलग अलग पन्नों पर .... कई प्रेम एक साथ जीती हुई हर लम्स...हर पहर हर मीठी उमस को रखने के लिए बस यही appropriate आला हो जैसे। इन पहाड़ी रातों को फोड़ोगे तो .... कई सोते sanddunes और कई जागे समंदर गलबहियां डाले मिलेंगे ...... in a rarest pure form. और सिर्फ़ तीन शब्दों की धड़क ओ रे पिया ..... ओ रे पिया ....करता हुआ सांय सांय जंगल रातें introvert हैं..... कहा था ना कविता पूरी हुई। धुन ध्वनियाँ दिखीं होंगी ... तो समझो एक पहाड़ी रात जी आये आप। कल रात खिड़की से देखी रात ....आज सुबह लिख दी।😊😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें