कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1085

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मैं अपने लिए हमेशा आख़री पायदान वाली तलबगार रहीं हूँ

मैं अपने लिए हमेशा आख़री पायदान वाली तलबगार रहीं हूँ... ऐसा नहीं कि पंख पाज़ेब और पकड़ का अंतर नहीं जानती पर वो कहते हैं ना... खालिस साँचा एक बार बन जाये तो बस ... सरस ही xerox होती हैं चीज़ें चीज़... कैसी ? साँचा... कैसा ? और वो भी तुम्हारा? अरे ! हाँ ..... दो पहलू मेरे....वाला साँचा पंख में उड़ान इस तरफ अंक में तूफान उस तरफ़ और बीच में वेग .... मानसिकता वाला नहीं ... मानस रिक्तता वाला अनंत अनहद चिरजीवी एक दिन इसी वेग को पार करेगी मेरी सोच मेरा समय मेरी सहिष्णुता मेरा साँचा भी ... पर शनैः शनैः
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें