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क्योंकि मैं उदासियों से गुज़र चुकी हूँ मुझे खुशियों की खनक प…

क्योंकि मैं उदासियों से गुज़र चुकी हूँ मुझे खुशियों की खनक पता है। अब मैं झट से उन्हें गले लगाने लगी हूँ। कम ज्यादा का डर भी तो तभी सताता है जब कुछ खत्म होने को हो। अम्बार लगाना अपने हाथों में है .... टेबल पर तो बस कप पड़े हैं ।एक उदासी वाला और एक खाली वाला हाथ बढ़ाओ.... बाहें खोलो ... लब हिलाओ.... खाली कप तुम भर लो । खुशियां आसपास बिखरी हैं। उदासी तो पी चुके होंगे अब तक ।अब दोनों कप खाली हैं। तो चलें .... मुस्कुराएं। Happy women's day .....💐💐💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें