ककल्पनाशब्दों के बीच
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कभी सोचती हूँ बेवज़ह कह दिया करती हूँ

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कभी सोचती हूँ बेवज़ह कह दिया करती हूँ... तुम तो बस मुस्कुरा भर देते हो सिर्फ सुना करो कल्पना ! जो नहीं कहते वहीं शब्द सबसे ज्यादा पहुंचते हैं देखो मैं पहुंच रहा ना तुम तक ये कैसी जादूगरी है ? मैं कह कर भी नहीं पहुंच रही तुम बिनकहे छू रहे तुम अलग हो शायद कोई अलग नहीं हो सकता क्या तुमसे । अबोला प्रेम ... कैसे सीखूं ये मंज़र रोक देने वाला प्रेम पत्थर सा बस रख देने वाला प्रेम देख लो पर चखो मत वाला प्रेम जियो मत वाला प्रेम लिखो मत वाला प्रेम दिखो मत वाला प्रेम दिखाओ मत वाला प्रेम भरपूर पर..... जताओ मत वाला प्रेम ये भनक ना लग जाने वाला प्रेम कहीं सुकून न दे दे वाला प्रेम ना मुस्कुरा सकने वाला ना रो सकने वाला प्रेम कहाँ रखूं बस ये बता दो...... ये ना रखने वाला प्रेम इतना भर भर प्रेम दे रहे अपना जादूगरी भी तो दे दो मुझमें तो तुम भरे हुए हो.... अबोला प्रेम कहाँ धरूँ ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें