कल्पनाशब्दों के बीच
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नारी हूँ मैं

नारी हूँ मैं ....... नारी हूँ मैं , ये न समझ कि एक बुत हूँ तेरा हर दर्द धारण करती हूँ मैं तेरा साथ आमरण देती हूँ मैं कल्पना से परे हूँ , क्योंकि नारी हूँ मैं तेरा हर व्यवहार सह जाती हूँ मैं तेरे अहम् में कई बार ढह जाती हूँ मैं सहन शक्ति से परे हूँ , क्योंकि नारी हूँ मैं तेरे जीवन की लौ जलाती हूँ मैं तेरे सपनों को हाथों से सजाती हूँ मैं क्षमता से परे हूँ , क्योंकि नारी हूँ मैं तेरी खुशियों को दामन में संजोती हूँ मैं तेरी कमियों को आंसुओं में धोती हूँ मैं आशा से परे हूँ क्योंकि नारी हूँ मैं अब इतना न खेलो मेरी आत्मा से कि प्रश्न पूछना पड़े ये खुद से कि क्या मैं बुत हूँ ? या नारी हूँ मैं ? या बुत बन गयी नारी हूँ मैं ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें