कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0992

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तुम्हारी कहानियों में मेरी आँखें हूबहू दिखती हैं.... मेरे ल…

तुम्हारी कहानियों में मेरी आँखें हूबहू दिखती हैं.... मेरे लब क्यों नहीं उकेर पाते तुम ? मैंने एक रोज़ जादूगर से पूछा। तुम कल्पना हो ना.... शब्दों से खेलती हो । कुछ होती हो कुछ कहती हो। कुछ बोलती हो कुछ और दिखती हो। तुम रुकती कहाँ हो... इस लिए .....आंखें मूंद लेता हूँ ... कुछ लिख देता हूँ...तुम बन जाती हो......कल्पना कहानियां तो बस शब्द हैं ... तुम धड़कन हो उनकी कल्पना फिर एक बार जादूगर में समा गई ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें