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रचना 0966

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तुम मिसरे कहो

तुम मिसरे कहो ..... हम मिश्री कहते हैं... इश्क़ सूफ़ियाना का कोई तय मिज़ाज़ थोड़े ही है.... 😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें