कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0958

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सोचते ज्यादा हैं ना हम... तो दिल पैरों से लिपट जाता है।

सोचते ज्यादा हैं ना हम... तो दिल पैरों से लिपट जाता है। जीते हैं चल.... सुनो ना...
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें