कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0916

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सौ सवेरों की एक रात जिस रोज़ गढ़ सकूँगी

सौ सवेरों की एक रात जिस रोज़ गढ़ सकूँगी ...... उस रोज़ मेरी कविता सुनना । आज टुकड़ा टुकड़ा शब्द रख लो । रिश्ता बना रहे। कलम ... कल्पना.... कागज़ वाली गुफ्तगू 😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें