भाषा / Language
ओह्हो....शुक्रिया कहना था
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ओह्हो....शुक्रिया कहना था ...
आपने मेरे आंखों का सम्मोहन पोंछ कर उंगलियों के पोरों पर मल दिया। खुद के लिए कविता तक तो ठीक था पर जब खुद के लिए खुद से किस्से गढ़ने लगो और शर्त भी रखो की सच हो हर चाहना ... थोड़ा खुदगर्ज़ी रही होगी मेरी। पर शुक्रिया... आपने साथ दिया ।संभलने तक साथ रहने का शुक्रिया। self pity का mode अब switch off कर दिया। अब उदासी कहानियों से निकल कर हवा में घुल गई। आप और मैं हूबहू एक जैसे हैं।
सम्मोहन नीला है और कल्पना सफ़ेद।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें