भाषा / Language
जिस किसी रोज़ आहत होती हूँ
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जिस किसी रोज़ आहत होती हूँ .....
दुख बून्द बून्द उतरता जाता है
उस रोज कागज़ हो या भीगा आँचल
शब्द नहीं उभरते
धब्बे उतर आते हैं
काले पर सफेद ......सफेद पर काले
रंग हीन
दुख लिखना कितना तो आसान है
पर उसके धब्बों को तुम्हारी कमीज पर टांकना
इस भरी दुनिया के लिबास में काढ़ना ...कितना मुश्किल
जिम्मेवार और जिम्मेदार में फ़र्क जान गई हूं
इस लिए....अब से तुम ख़ारिज
दुनिया हमेशा के लिए बर्खाश्त
और मैं.....
मैं ..... सिर्फ आज के लिए मुलतवी हूँ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें