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रचना 0834

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दिन भर के दाग़ धोने हों तो धारा कहो

दिन भर के दाग़ धोने हों तो धारा कहो रात भर के धब्बे सोखने हों तो धरा धारा और धरा में"आ" का ही तो अंतर है..... तो तुम एक बार कह कर तो देखो ...........आ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें