ककल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0773

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कभी मेरा यथार्थ होना

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कभी मेरा यथार्थ होना .... कभी मेरी कल्पना में होना .... कभी तुम्हारी कल्पना होना .... कभी तुम्हारा यथार्थ होना.... हम दोनों का सब कुछ परिभाषित कर सकता है बस दो शब्दों से ..... यथार्थ....... और कल्पना....... इस छोर से उस छोर तक...... अनंत सा
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें