कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0767

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"रंगरेज़

"रंगरेज़".... सुना है ......"रंगरेज़" हो बड़ा .....गुरुर रखते हो अपने इस हुनर का वो कुछ उदास लफ्ज़ वो कुछ नाराज़ लफ्ज़ रख आई हूँ...... तुम्हारी ड्योढ़ी पर फेर दो... फेर दो ना मुट्ठी भर चांदनी इन पर या.... क्षितिज का लाल गुलाल ही मल दो चलो उन तारों की जगमगाहट ही दे दो या .... वो वाला धनुक ही सिल दो इन पर गर ये नाराज़ लफ्ज़ मुस्कुरा गए और फिर मुझसा इतरा गए तो वादा है ..... रंग लूँगी अपनी सभी "कल्पनायें"...... तुम से मुझे रंगना चाहोगे न ...........रंगरेज़ ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें