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रचना 0765

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जिस दिन भी ना बोलूँ ना तुमसे

जिस दिन भी ना बोलूँ ना तुमसे ..... सगरे दिन की तह नहीं खुलती और ये रात..... ये रात और मुंह बिचका देती है तुम सुन रहे हो ना ....चाँद? चलो बोले ना सही दिन भर... अब कुछ लिख दो मेरे नाम का 😊😊😊😊😊याद
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें