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रचना 0707

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मेरी भी खानाबदोशियाँ अब ठहरना चाहती हैं

मेरी भी खानाबदोशियाँ अब ठहरना चाहती हैं ..... लाओ कुछ देर अपना निर्वात मुझे दे दो.... अहा! शब्दों की पनाह कितनी दिलकश है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें