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रचना 0687

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सब कुछ तो था सुधा के पास। प से पैसा ,प से प्यार

सब कुछ तो था सुधा के पास। प से पैसा ,प से प्यार ह सेें हुनर ,ह से हंसी, ख से खूबसूरती, ख से ख्वाइशें। फिर भी वीरान सीढ़ियों से चढ़कर उस कमरे तक पहुंचना जहां चंदर कम उसकी किताबें ज्यादा घूरती थी । सुधा हमेशा गलत में सही ढूंढती थी।बस यही उसको कमज़ोर कर देता था चंदर के सामने । खुद को खरोंच कर दूसरों के घाव भर देने की लाइलाज बीमारी ने सुधा को खुद से बहुत दूर कर दिया। वो पल जीती थी दूसरों के लिए.... दूसरों के साथ क्योंकि देना जानती थी हमेशा से। देती रही पर सिद्ध नही कर पाई। जिसकी झोली स्नेह मेह नेह से भरी हो वो खाली होने नही ... बांटने जाता है। सुधा उस रोज बांटने गयी थी और आज तकरीबन सौ प्रश्न खुद पर बेवजह लादे घूमती है। खैर सफाई किसको और क्यों दें भला? खुद को धोखा देते देते चंदर से सच बोल दिया। अब ना सीढियां ऊपर जाती हैं ना नीचे । सफर ठहरा हुआ शांत ..... सुधा और चंदर के बीच ...अनहद..... पूर्णविराम के साथ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें