भाषा / Language
शब्दों की सीपियों में भरकर अपनी नीली चाहनाएँ मैं रोज़ सतरंगी…
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शब्दों की सीपियों में भरकर अपनी नीली चाहनाएँ मैं रोज़ सतरंगी मोती बन जाती हूँ ।
कहाँ....?
इस कोरे कागज पर .... और कहां?
थोड़ी अलग हूँ ना ?
और ......थोड़ी जिद्दी भी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें