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रचना 0683

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जहाँ इन नज़्मों को संभाल कर रखते हो वहां मेरी नाम की तख़्ती न…

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जहाँ इन नज़्मों को संभाल कर रखते हो वहां मेरी नाम की तख़्ती न सही ,अनुगूँज तो आती होगी जरूर। फड़फड़ाता कागज़ गवाही तो यही दे रहा ।बाकि तुम शब्दों में मोहे गुमशुदा कर देने में तो हमेशा से माहिर रहे हो।बैरी तो ये कलम है पर तुम्हारा कागज़ आज भी मेरा दीवाना है ।मेरी खुशबू को तुम्हारे लफ़्ज़ों से उड़ने नहीं देता ।अपनी हथेलियों से ढांक कर रखता है ।तुम्हारी नज़्मों की महक कायम है मुझसे।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें