सुनो चाँद ! मसरूफ़ ना हो तो चले आओ... कुछ कहना .....कुछ सुनाना था कुछ अनकहा प्रेम छिपाना था ।
रचना 065026 फ़रवरी 2017भाषा / Languageहिन्दीEnglishसुनो चाँद ! मसरूफ़ ना हो तो चले आओ✦सुनो चाँद ! मसरूफ़ ना हो तो चले आओ... कुछ कहना .....कुछ सुनाना था कुछ अनकहा प्रेम छिपाना था ।कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें