कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0650

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सुनो चाँद ! मसरूफ़ ना हो तो चले आओ

सुनो चाँद ! मसरूफ़ ना हो तो चले आओ... कुछ कहना .....कुछ सुनाना था कुछ अनकहा प्रेम छिपाना था ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें