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रचना 0644

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मुद्दा तो हमेशा से सोच की आज़ादी का ही था

मुद्दा तो हमेशा से सोच की आज़ादी का ही था ..... पता नहीं देह पर आकर क्यों रुक गया । सोच को देह से आज़ाद करूँ ......या देह को सोच से?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें