कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 0633

भाषा / Language

अगर मेरे शब्द चुभते हैं

अगर मेरे शब्द चुभते हैं..... तो मेरी इस किताब को जला दो मैं भी ठीक यही करती हूँ कुछ चुभता है तो .... अपने शब्दों का लोभान खुद पर छिड़क कर जला कागज़ आपको पेश कर देती हूँ आपकी नज़र कर देती हूँ मैं लिखती रहती हूँ अपने जंगल के जंगली फ़ूल बिखेरती रहती हूँ थक जाने तक ठूंठ हो जाने तक आग शांत हो जाने तक।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें