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रचना 0561

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सफर पर निकलते वक़्त

सफर पर निकलते वक़्त "खुदा "ने बस एक किरदार दिया और कुछ लकीरें दी मसखरा "इंसान "पूछ बैठा "खुदा " जब तू तक़दीर लिख ही सकता था , तो "लकीरों "से क्यों ? "अक्षरों "से लिख लिया होता " खुदा " मुस्कुराया और बोला गर "अक्षरों "में लिखा होता तो तू पढ़ लेता हो सकता है , मेरी जुबां पकड़ लेता जो मैं रच चुका उसमें तू क्या गढ़ लेता ? फिर यहाँ कोई नहीं होता जो मुझे खुदा कहता इसलिए " लकीरों "में नसीब बक्शा है इसी में तेरे किरदार से लिपटा एक नक्शा है अपने हुनर से इन्हें आकार दिया करना खुद में रमा रहना और कहीं भटक जाये तो पुकार लिया करना
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें