रोज़.... इस रात को निगलता है चाँद और .... उसी चाँद को निगलकर मैं .....रात हो जाती हूँ
रचना 05546 नवंबर 2016भाषा / Languageहिन्दीEnglishरोज़.... इस रात को निगलता है चाँद✦रोज़.... इस रात को निगलता है चाँद और .... उसी चाँद को निगलकर मैं .....रात हो जाती हूँकल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें