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रचना 0554

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रोज़.... इस रात को निगलता है चाँद

रोज़.... इस रात को निगलता है चाँद और .... उसी चाँद को निगलकर मैं .....रात हो जाती हूँ
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें