कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0551

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नाहक ही मार दिया

नाहक ही मार दिया कंकर तुमने मेरे वजूद पर इक एहसास का की जानते हो की कुछ भी नहीं तुम्हारे लिए मेरे पास उजास सा बेहद अनमोल है इक रिश्ता दोस्ती का ..... विश्वास का ...... क्यों शून्य करते हो देकर स्पर्श आभास का
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें