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रचना 0475

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कभी कभी आईने में ....वो हरगिज़ नहीं दिखता

कभी कभी आईने में ....वो हरगिज़ नहीं दिखता जो मैं होती हूँ और कभी कभी .... आईने में ....वो वो दिखने लगता है जो मैं हरगिज़ हो नहीं सकती ऐसा तब होता है .... जब कुछ...... स्थिर होना चाहता है मुझमें बस रुक कर ....चिर होना चाहता है मुझमें अजनबी.... खुद से हो जाना शायद इसे ही कहते हैं.... इक बार फिर .... रूबरू होना इसे ही कहते हैं... Better to find myself in my own eyes .... rather than getting lost in others. 😊😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें