भाषा / Language
जब भी मन उदास होता है
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जब भी मन उदास होता है
तुम झर झर
गिरने लगते हो आस पास
निश्छल भावनाएं
अंजुरी में भर कर
मंद मंद मुस्कुराते हुए
ऐसे चले आते हो मुझ तक
की लगता है
इक सरिता बह रही है
हमारे बीच
और मैं ना चाहते हुए भी
चल देती हूँ
तुम्हारी ठानी हुई दिशा की ओर
निशब्द सी
ऐसे की जैसे
मैं थी ही नहीं कभी
मेरी उदासी भी
उदास रहती है मुझसे
क्यूँ की
हर बार बह जाती है
तुम्हारे नेह से
तुम्हारे स्पर्श से
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें