भाषा / Language
कभी आंसूं
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कभी आंसूं
गिरा डाले
कभी अलफ़ाज़
बहा डाले
हर बार "मैं "
घंटों भीगती रही
और ये
"कमबख्त दिल "
सिर्फ
चंद लम्हों के लिए
बस "हल्का" हुआ
"ये दिल " हद में है
या
" मैं "बेहद हूँ ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें