कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0470

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कभी आंसूं

कभी आंसूं गिरा डाले कभी अलफ़ाज़ बहा डाले हर बार "मैं " घंटों भीगती रही और ये "कमबख्त दिल " सिर्फ चंद लम्हों के लिए बस "हल्का" हुआ "ये दिल " हद में है या " मैं "बेहद हूँ ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें