भाषा / Language
प्रेम की कोई हद नहीं होती
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प्रेम की कोई हद नहीं होती
इसीलिए तो सब बंधते चले जाते हैं
अगर कोई होती
तो सब उड़ते चले जाते
फिर प्रेम कहाँ.....
हद कहाँ......
बेहद कहाँ .....
कोई कहाँ .....
कोई कहाँ ......
ये बेहद वाली परिधि में प्रेम सदियों से पनप रहा है
बिना कहे
बिना सुने
बिना देखे
बिना दिखे
हंसी ख़ुशी
हौले हौले
बड़े इत्मीनान से बस सदियों से धड़क रहा है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें