ककल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0424

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कजरारे ...."नैन

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कजरारे ...."नैन " चल पड़े हैं आज फिर .... तुम्हारी तलाश में मिल जाओ तुम .... इस आस में जानती हूँ ....... थक कर चूर लौटेंगे खाली हाथ लौटेंगे बाँवरे से पूछेंगे .... "कल्पना"..... "ये काजल फैला तो नहीं "? इंतज़ार और इन्तेहाँ का फर्क.... कैसे बताऊँ इन्हें ? कैसे समझाऊं इन्हें ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें