भाषा / Language
यकीन मानियेगा
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यकीन मानियेगा ....
कल रात का चाँद
डूबा नहीं
दिन निकलते ही
उभर अाया मेरी हथेलियों में
चुपके से
मुस्कुराकर बोला ...
चलो आज तुमसे गुफ्तगू की जाय
थोडा और करीब वाली जुस्तजू की जाय
आगोश में आते ही
चाँद पिघलने लगा
मैं क्या कहती
वो ही कहने लगा
उसकी हसरतें
मेरी ख्वाइशों से
मेल खाती रही
और
इक लम्बी फेहरिस्त
इश्क़ियत की
मैं भी बनाती रही
चाँद अब भी पिघला हुआ
खुबसूरत है मेरी हथेलियों में
और मैं भी गुम हूँ
उसकी खट्टी मीठी पहेलियों में
साँझ हो गयी ...चाँद उठो
ले जाओ अपने संग
मेरी भी कुछ मिलती जुलती ख्वाइशें
कभी जलकर बुझती
कभी बूझकर जलती ख्वाइशें
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें