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रचना 0393

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रात

रात ..... ये ख्वाब जुगनू थे सुबह ..... तितली से मिले रात .... झिलमिला रहे थे सुबह ..... इठलाते मिले खुश हूँ ..... मेरे ख्वाब रात - दिन सिर्फ मेरे ही आँगन में उड़ते सिर्फ मेरे ही पास रहते कभी .....मैं उन्हें छूती कभी .....वो मुझे छूते कभी .....वो मेरे होते कभी .....मैं उनकी होती
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें