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रचना 0382

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Aaj kuch alag kalpana

Aaj kuch alag kalpana ..... ये बात सच है कि स्त्री जब कुछ अलग लिखती है तो लोगों के एक्सप्रेशन उसकी सोच से मेल नहीं खाते ...... लोगों को judge करने की बीमारी होती है...... हर पाठक यही चाहता है की कलमकार उसकी सोच से मिलता जुलता कुछ कागज़ पर उकेर दे ... जहाँ हमने उनको दग़ा दी.... जरा अलग सोच लिया .... आप बागी करार दिए जाते हैं... सकारात्मक और नकारात्मक पहला तोप का गोला ..... स्त्री लेखिका प्रेम के अलग अलग रूप लिखने लगे तो वो मूक निमंत्रण ही समझा जाता है ... ऐसी स्त्री जो सतत तलाशती रहती है .... कुछ बोल्ड लिख दे तो जरूर एक्सपीरियंस किया होगा .... हर रचना को व्यक्तित्व के साथ टैग कर देना यही मानसिकता से स्त्री जूझती रहती है ये ऊपर लिखी सारी बातें इक सच है .... पर दूसरा सच ये भी है की ..... "की फरक पैंदा है.".... लेखनी में खुदगर्ज़ हो जाओ .... मैं यही सोच के लिख रही हूँ .... कोई पढ़े.... न पढ़े अगर दूसरों की सोच लेप ली खुद पर तो कलमकार किस बात के ? कविता खुद लिखती है अपने आपको और छपती भी खुद है ..... कोम्प्रोमाईज़ नहीं करती कविता .... कोई कविता गलत नहीं होती बस कुछ ह्रदय संकीर्ण और कुछ दिल jeolous .... वैसे भी सोच तो सोच है उसे पकड़ा नहीं जा सकता .....बस परोसा जा सकता है... 😊😊😊😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें