कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0381

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डायरी की तरह ....ज़िन्दगी के

डायरी की तरह ....ज़िन्दगी के पीले पन्ने पलटती हूँ तो अजनबी पाती हूँ खुद को अपने ही शब्दों को और एकाकी भी बस.... मेरी गंध बसी पड़ी है उनमें शायद इसीलिए ये अब तक ठोस हैं
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें