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रचना 0362

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हमको खुशफहमी में रहने का हुनर आता नहीं

हमको खुशफहमी में रहने का हुनर आता नहीं दुश्मनों को दोस्त कहने का हुनर आता नहीं दर्द की सूरत ख़ुशी में भी निकल पड़ते हो तुम आंसुओं क्या तुमको बहने का हुनर आता नहीं आइये क़िबला शरीके गम मेरे हो जाइये मुझको तनहा गम सहने का हुनर आता नहीं ए किनारों साथ नदियों का कभी ना छोड़ना बिन तुम्हारे इनको बहने का हुनर आता नहीं टूट कर भी तुम बयां करते हो अपनी दास्ताँ ए खंडर क्या तुमको ढहने का हुनर आता नहीं डूब जाने का लगा रहता है डर ,उनको ,जिन्हें आपकी आँखों में रहने का हुनर आता नहीं क्या कहूँ ,कैसे कहूँ और कब कहूँ बोलो "मयंक" मुझको अपनी बात कहने का हुनर आता नहीं -----डॉ.के के सिंह "मयंक " लखनऊ
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें